Shri Ramdarbar

Thursday, May 17, 2012

नया धरातल

सबको राम राम......
पहली शुरुआत मैंने मन की बातों को लिखने से की थी..बहुत हलकान होती थी..ऐसा लगता था ध्यान करके उठा हूँ..शुरूआती दौर में ख़राब लिखे से भी प्यार करने लगा..लगभग प्रतिदिन लिखता..कभी कभी लगता कि बहुत अच्छा बन पड़ा..बस उसी समय से यह शौक और बढ़ गया..इंसान किसी को कहे नही, मन ही मन खुद को बहुत ज्यादा मानता कि मैं ये हूँ, वो हूँ..इस स्वभाव से मैं भी अछूता नही रहा..खुद को कही किसी कतार में खड़ा जरुर पाता हूँ ..बस शुरूआती दौर में लिखी यह रचना वैसी ही है जो मुझसे, मेरे और को अवगत कराती है..शायद ज्यादा कह गया लेकिन अब कह ही दिया है देख लेंगे...आप सबकी मंगल कामना के साथ..

नया धरातल 

कोरा कागज, हाथ में कलम
और कुछ विचारों से
शुरू करता मैं सफ़र|

लोगो की दुनिया से अलग
अलग दुनिया में बैठा
विचारों को संगृहीत कर
संतुलित करता|

शब्द कुछ कतार में ऊपर 
कुछ कतार के नीचे
और कोरे कागज का इतिहास बदलता|

जब कम पड़ते विचार
आँखे उठाकर आसपास की  
हरकतों, चहल-पहल को देखता
और कुछ को विचार श्रृंखला में जकड लेता|

परिमार्जन करता उनका
और कलम से उतार लेता
कोरे कागज पर
और मैं साधारण से
सृजनशील इन्सान हो जाता,
नए धरातल को छूता|
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ललित कर्मा
१०/०४/२००५

"मनमोहन "

सबको राम राम...
बहुत दिनों के बाद कोई रचना पोस्ट कर रहा हूँ..कलम इस बीच रुकी नही रही..बस कंप्यूटर और समय का अभाव बना रहा..आज संस्थान में अतिरिक्त समय निकाला है..शेष कुशल है..


"मनमोहन "

माना कुछ नही है दुनिया में,
दुनियादारी अंधी खोह,
मरने से डरता है जी,
अचंभित हूँ, है यह कैसा मोह|१|
--
धन्य प्रभु तू और तेरी माया,
तूने जो यह इंसान बनाया,
कह सकते है, है यह भरमाया
रह-रहकर इसे तूने कुशल समझाया|२|
--
इंसान का कोई दोष नही,
यह रचने वाले की माया है,
सुंदर सृष्टि जो मोहे,
प्रशंसा का पुरस्कार पाया है|३|
--
क्या खूब संसार बनाया है,
बनाकर इंसान रिझाया है,
रिश्तो की मोहिनी में डालकर,
तूने खुद को भुलावाया है|४|
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ललित कर्मा
१२/०५/२०११, ७;30PM

Wednesday, November 23, 2011

"चार महिलाए"

सबको राम राम......

ज्ञानशिला टाउनशिप में अपने फ्लैट बनने की तरक्की को देखने गया था...वहाँ प्रवेशद्वार पर महिलाये गड्ढा खोद रही थी...उनसे बातचीत से पता हुआ कि यहाँ टाउनशिप के प्रवेश द्वार के पास मंदिर बनेगा...मंदिर बनने का जानकर अच्छा लगा...उनके क्रियाकलाप को देखने लगा...सबसे अच्छी और प्रभावित करने वाली बात उनकी हँसी थी...बात भी करती जाती और काम भी...यही कहने की छोटी सी कोशिश  है.....

"चार महिलाए"

गीली मिट्टी खोदती है,
चार महिलाए,
बातें भी करती जाती,
ये चार सबलाए|१|
---
उनमे से एक कहती,
पैसे मिले तो काम करो,
नही तो, नही बोल दो,
फ़ोकट में यूँ न मरो|२|
---
गड्ढा करने का काम मिला,
मंदिर की नीवं का,
पहले इससे और काम था,
भरण-पोषण करती है ऐसे जीव का|३|
---
हँसती-मुस्कुराती, करती काम,
दिखता न दिल का दुःख,
मगन काम-बात में,
शायद इसी में मिलता सुख|४|
---
कितने ही काम करती,
यह उदाहरण है बस एक
जीविका चलाने को,
ढुंढें-देखे तो मिलेंगे अनेक|५|
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ललित कर्मा
२५/०९/२०११ २:१० pm

Thursday, October 20, 2011

"आज ऐसा लगता है"

सबको राम राम.....
किसी पल खुद खड़े होते है अपना रास्ता रोके...एक समय में आशा भी होती है और निराशा भी ...बस तनिक ध्यान बनाये रखना होता है...करने पर कायम रहे तो वही दिन यादगार हो जाता है...और भर जाती है आशा की झोली...रास्ते खुद-ब-खुद खुल जाते है...उत्साह भर जाता है... आज ऐसा ही लगता है...       


"आज ऐसा लगता है"

खुद रोके खड़ा रहूँगा,
अपना रास्ता,
 होगा यह कई बार,
विश्वास नही होता?|१|
---

तोड़ देना चाह रहा है
 आज मेरा मन,
बेढियाँ जो राह रोके,
दे रही थकन|२|
---
समय है दो किनारे आज के,
अजीब है यह झरना,
कल-कल के बीच,
बहते रहना|३| 

---
 कल और आज के बीच,
 फासले है दो कदम के, 
 तय कर लो तो आज है, 
 न करो तो कल के|४|
---
 लाँघ दी आज सारी दीवारें
 उन पुरानी रुढियों की,
रहा था न जिनसे
तन मन का तेज बाकी|५|
---
अब सरल आज लगता है,
 गिरी शिखरों को छूना,
पंख मिले हो जैसे,

खुले आसमान में उड़ना|६|

---

रफ़्तार से दौड़ना-चलना

सरल आज लगता है,

निष्कंटक हर मार्ग,

आज ऐसा लगता है|७| 

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ललित कर्मा
०६/०९/२०११

Tuesday, August 30, 2011

"बुरी लगती हूँ"

सबको राम राम....
बात छोटी है किन्तु गहरी है...माँ अपने बच्चे को टोकती है...पत्नी अपने पति के लिए परेशां होती है...अपनों के प्रति उत्तरदायित्व व सामाजिक कर्तव्य अनुशासन में रहने को कहते है...ये सब अपनों को सवरतें देखना चाहते है...यह उनका प्यार है...
 
"बुरी लगती हूँ"

बुरी लगती हूँ,
खलती हूँ,
रोकती हूँ,
आवारा भटकने से,
माँ हूँ, पत्नी, जिम्मेदारी,
हूँ मैं दुनियादारी|
....................................
ललित कर्मा
२०/०८/२०११ ७:५२ Pm 

"पगडण्डी : दो पहलु"

सबको राम राम....

जमीं पर सड़को, पटरियों के अलावा भी रास्ते है जिसमे कोई साधन विशेष की जरुरत नहीं लगती बस चलना पड़ता है...पगडंडी उसे कहते है...इंसान के अपने कदमो की निशानी को देखकर ख्याल आता है... 
 


"पगडण्डी : दो पहलु"
रे इंसान,
बहुत पापी है तू,
पगडंडीयाँ तूने बनाई,
जहाँ जहाँ रखा कदम ,
वहाँ वहाँ घास नहीं आई|१|
---
रे इंसान,
तू कितना महान,
तूने रखा कदम जहाँ जहाँ,
कुदरत ने तेरे लिए,
घास फूस हटा लिए|२|     
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ललित कर्मा 
 २२/०८/२०११ ३:५२ pm    

Sunday, May 8, 2011

"इक राम ढूँढ़ता हूँ"

सबको राम राम,
हर समय मन-मष्तिष्क व्यस्त रहते है..ना जाने क्या पाने को.. कुछ खोज तो चलती होगी.. हर व्यक्ति के लिए यह खोज प्राथमिकताओं  के कारण अलग- अलग है.. फिर भी कही एक जगह ऐसी है जहां सब एक हो जाता है..
 
"इक राम ढूँढ़ता हूँ"


सिर्फ भवनों और सड़को की जमावट है, कहलाता है शहर है,
यहाँ वृक्षों की शीतल छाँव और शहर में गाँव ढूँढ़ता हूँ |१|
--
ओढ़ना कफ़न पर तिरंगा होता है बिरलो का सुभाग,
मातृभू पर कुर्बान जाऊं, नित ही ऐसा दांव ढूँढ़ता हूँ |२|
--
मानूँ है सब यथा सुखी, है सब साधन सुविधा उपलब्ध,
देव निवास कर सके, ऐसा एक दर धाम ढूँढ़ता हूँ |३|
--
है सब प्राणी ईश्वर की संतान, है हर शरीर में ईश्वर का वास,
इससे एकमय हो गया हो, ऐसा एक भी, इंसान ढूँढ़ता हूँ |४|      
--
थोड़ा कुछ जो संतोष है, जीवन में भगवान का प्रसाद है,
बनी रही कृपा उसकी, मौके होता रहे ऐसे अविराम, बार बार ढूँढ़ता हूँ |5|
--
जीवन बीत रहा दौड़ भाग कर, हर काम ईश्वर का  काम है,
करूँ मन भर के आभार ईश का, ऐसा एक विराम ढूँढ़ता हूँ |६|
--
इच्छाए, चिंताए कभी कम न होगी, है ये अनंत गागर,
विलोपन हो या पा जाऊं सारी प्यास, ऐसा मगर एक सागर ढूँढ़ता हूँ |७|
--
है अनंत कथा इस खोज की, मनुजतन फिर मिला इसलिए,
खोजता हूँ फिर वही, वही इक राम ढूँढ़ता  हूँ |८|     
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ललित कर्मा
१०/०३/२००९ 

Monday, May 2, 2011

"सूरज आया"

सबको राम राम,  
वह सुबह बहुत मासूम थी जब मै जागा बिलकुल नन्हे शिशु सी | प्रारंभ बच्चो को सिखाने  के  तरीके से हुई और फिर दोपहर, शाम, रात तक आगे बढ़ी और फिर अंत से शुरुआत की ओर चली .... हर रात के बाद सुबह होती है ...


"सूरज आया" 
कौन आया?
सूरज आया, 
क्या लाया?
उजाला लाया|१|
--
उठो, उठो,
भोर हुई,
जल्दी करो,
रात गई|२|
--
मुह हाथ धोओ,
पेट साफ करो,
ठंडा/कुनकुना नहाओ,
और ईश का ध्यान करो|३|
--
खाना खाओ,
खाली पेट न यूँ घुमो,
फिर अपने काम लगो,
लगन से उसमे रामो|४|
--
घर आओ,
अब दिन ढला,
नीड़ हमारा है,
सबसे भला|५|
--
दीप-बाती आओ जला ले,
ईश वंदना करें,
हे प्रभु,हे कृपालु,
तू संताप हरे|६|
--
भूख लगी,
अब खाना खाए,
धन्यवाद कर,
प्रभु के गुण गए|७|
--
राम भला हो,
अब नीद सताएं,
सुंदर सपनों में,
अब खो जाये|८|
--
उठो कोई आया है,
कौन आया?,
सूरज आया,
उजाला लाया|९|
--
 चलो उठते है,
प्रथम धन्य हे भगवन,
भली नींद हुई,
दिखाए सुंदर स्वपन|१०|   
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ललित कर्मा
१८/०४/२०११ ३.१३pm


Monday, January 10, 2011

"यह बात तुम्हारी-मेरी है"

सबको राम-राम ...
             बस के सफ़र में था, लगा कुछ बात हो रही है जिसे उतारा जा सकता है| उसे शब्दों में बांधा| यह किसी को उपदेश नही है| मात्र आत्मावलोकन है| यहाँ, लिखने का एक उद्देश्य और भी समझा कि शिकायतों को दूर करने के लिए यह शौक अच्छा है | अच्छा लगता है| मन हल्का हो जाता है| "मैं-तुम" में कोई भी पात्र मान सकते है|

"यह बात तुम्हारी-मेरी है"

ऊपरवाला जानता है 
मैं-तुम क्या है,
हम वैसे ही चलते है,
जैसे वह चलाता है |1| 
---
दुनियादारी की यांत्रिकता नही दिखती-,
मैं-तुम, घुले-मिले जो है,
उपर उठकर सोचे, जाने,
यह जीवनी कैसी चलती है? |२|
---
आवश्यक साधन मात्र हम पा जाये,
धर्मं यह कहता है,
यह उपदेश भी है उसका कि;
व्यर्थ साधनों में स्व को न भुलाओ |3| 
---
परमार्थ तत्व भी जोड़े,
स्वनिर्माण के सपने में,
धर्म-अर्थ-काम-मोक्ष के चार पहिए,
जीवन गाड़ी को सही मोड़े |4| 
---
शिकायतों को दूर हटाने के लिए,
यह बात तुम्हारी-मेरी है,
सांसारिक रहकर ही, 
कर्मयोगी कहलाने का सुख पाने के लिए |5|
---
आपको अर्पण हूँ करता,
पुण्य-पाप कर्म सकल अपने, 
कर्मो को तौल-नाप के,
आप ही निश्चित कर जीवन के सफलता |6|
-----------------------------------------------
ललित कर्मा, इंदौर 
०२/०१/२०११ 

"श्रद्धा से सुमन चढ़ाना चाहता हूँ"

सबको राम राम.....
बगैर किसी भूमिका के मेरे माता-पिता को अर्पित एक रचना ..| सोचा की क्या भूमिका बांधू पर कुछ बना नही पाया क्योकि भूमिका के लिए कुछ भी कह पाना मेरे लिए अभी संभव नही बन पाया| आशा है आगे कुछ अच्छा लिख पाऊ....| "श्रद्धा से सुमन चढ़ाना चाहता  हूँ" यह शीर्षक से मैं खुद असमंजस में हूँ कि "श्रद्धा से सुमन " से यह अभिप्राय नही हो जाये कि वे अभी जीवित नही है| वे स्वस्थ है और अभी जीवित है | यह वाक्यांश पूजा के उद्देश्य से लिखा है और ऐसा जमा कि बदल नही पाया.....



"श्रद्धा से सुमन चढ़ाना चाहता  हूँ"

मनोभावों को निर्मल करना चाहता हूँ,
श्रद्धा से सुमन चढ़ाना चाहता हूँ|
कहना चाहता हूँ,
आप ही मेरी सकल कल्पना,
आप ही से अस्तित्व मेरा,
आप ही से चिंतन आधार,
आप ही हो आइना मेरा,
किया है आपने संघर्ष बहुत,
याद आते है मुझे,
नाराज हूँ मुझसे कि,
दो प्यार के बोल, बोल न सका, इसलिए
मनोभावों को निर्मल करना चाहता हूँ,
श्रद्धा से सुमन चढ़ाना चाहता हूँ |१| 
---
जी भर देख लेने दो माँ तुम्हारा चेहरा,
इसमें है छुपे है मेरे नयन,
देखता साकार रूप जिनसे अपना,
नही है हस्ती मात-पिता के आगे,
हूँ अकेला परदेस में,
आँचल से आपके दूर,
भरी नही है आपकी रिक्तता,
सोचता हूँ पल वह कि,
आप दोनों नही उपस्थित,
समझ न आता मेरा अस्तित्व ,
सिवाय काम के कोई है नही,
बना न सका काबिल खुद को,
ढूंढ न सका भीड़ के साथ अस्तित्व,
बना न सका पहचान अपनी,
हूँ शर्मिंदा इसलिए भी, 
मिलाऊ नजरे  किस तरह,
मैं खुद पर रोना नही चाहता, इसलिए,
मनोभावों को निर्मल करना चाहता हूँ,
श्रद्धा से सुमन चढ़ाना चाहता हूँ |2|  
---
रूपए दो और भौतिक साधन,
मन के बहलाव के,
प्यार के आपके कर्ज चुकाने,
हूँ अभी अपात्र,
कर्ज भला क्या चुकने पाएँगा,
सहयोग करने का मन संतोष पाएँगा,
वह भी न कर सका तो धिक् है जीवन,
कोसना नही चाहता हूँ
भाव आ ही रहे है संग-संग, इसलिए,
मनोभावों को निर्मल करना चाहता हूँ,
श्रद्धा से सुमन चढ़ाना चाहता हूँ |3| 
---
बचपन से लेकर आज तक,
दिया सहारा पल-पल,
नही मौजूद हो आप यहाँ,
आवाज पड़ती है कानो पर 
कर यह और न कर "ललित" यह,
होता मार्ग प्रशस्त, 
कृतघ्न हूँ कैसा,
लड़ता हूँ फिर हर दम,
लड़ने को बजे खुद से, 
पहनता सेहरा सफल होने पर,
और पहनाता आपके सिर काँटों का ताज,
गुण-दोष गिनाना नही चाहता, इसलिए,  
मनोभावों को निर्मल करना चाहता हूँ,
श्रद्धा से सुमन चढ़ाना चाहता हूँ |4|  
---
अब भी क्या शेष है?,
निर्मल होना मन का,
कसर रह गयी है अब भी बाकी? 
देख रहा हूँ, देखते हो आप,
नही हो उपस्थित,
फिर भी गेह मे ही आप अवस्थित,
समक्ष द्वयमूर्ति  के खड़ा,
मन के निर्मल होने तक,
हाथो मे लिए सुमन,
स्वीकार होने तक,
इंतजार करना चाहता हूँ, इसलिए 
मनोभावों को निर्मल करना चाहता हूँ,
श्रद्धा से सुमन चढ़ाना चाहता हूँ |5|  
--------------------------------------------------------------

 ललित कर्मा, इंदौर 
१९//०३/२००६

Monday, January 3, 2011

बातोँ में गुम


सबको राम राम......

                यह दृश्य आँखों के सामने जब भी आता है खुद से प्रश्न पूछता हूँ कि क्या सच में मेरी संवेदनाए मर गयी है जो इतना निष्ठुर उत्तर बन आया| क्या ऐसे ही बातों-बातों में गुम हो जायेगे ये और इन जैसे बच्चे? प्रश्न कठिन है, जवाब आज तक नही ढूंढ पाया? आशा है शीघ्र ही समाधान मिलेगा.....शायद मैं-तुम-हम में से कोई लगा होगा इस समाधान में .......



" बातों में गुम " 


दो लड़कियों को देखा
कचरा बीन रही थी,
चार-पांच साल उम्र रही थी,
दोनों की,
वह जा रहा था,
सायकल पर हो सवार,
रोज की तरह,
जब जाता है वह ,
देखता है मकान-दुकान,
गाड़ी-घोड़े, आते-जाते लोग,
सहसा दो ये बालिकाएँ भी दिख  पड़ी,
उसने मुझसे पूछा,
तुम्हे कुछ होता है?,
ऐसा देखता है जब,
मैंने कहा - मुझे क्या होगा?
तुझ जैसा मैं भी  हूँ,
दो बातें तू कह लेगा,
और उनको चार बना कर,
मैं कह दूंगा,
इन्ही बातों में बच्चियाँ गुम हो जाएगी,
वे बच्चियाँ जो कचरा बीन रही थी|
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ललित कर्मा, इंदौर
२७ / ०८/२००६

Monday, December 27, 2010

" संसार नया "

सबको राम राम .......      
                            हमारे-तुम्हारे सोचे अनुरूप जब समय अच्छा बीत जाता है तब बहुत ख़ुशी होती है| सभी के साथ मिल-बाटने की इच्छा होती है| उस समय लगता है यह दुनिया बहुत प्यारी है | यह प्रसन्नता अपने-पराये का भेद भुला कर सभी को एक बना देती है| बना देती है सबको अपना और बनाती अपने सपनो का संसार.......
          
 " संसार  नया "

एक हाथ लेकर कल्पना,
रचता संसार नया ,
देखता सबको अपना ,
मन में खुश हो होकर,
देखता संसार नया|1|
---
आशा नई, अंदाज नया,
नवजीवन का उत्साह नया ,
शब्द वही, भाव नया, 
हाड़-मांस कि देह में,
उर्जा का संचार नया,
विश्वास नया, प्रयास नया,
नया-नया, बदला-बदला,
संसार नया |2|
---
कल्पना नई, उड़ान नई, 
आँखों में चमक,
होंठो पर मुस्कान नई,
नया-नया, बदला-बदला
संसार नया |3|
---------------------------------------------------------
ललित कर्मा, इंदौर
२१/०१/२००६

" एक और बात "

सबको राम राम ......
                          श्री वैष्णव प्रोद्योगिकी विज्ञान एवं  संस्था के साढ़े चार साल का समय मेरे लिए बहुत यादगार है| २००७ पास आउट बेच के विद्यार्थी (विशेषतः  कंप्यूटर , आई. टी., इलेक्ट्रिकल, टेक्स., एम्. सी. ए.  ब्रांच के विद्यार्थी) चार साल से जिनसे संपर्क था, बहुत करीबी हो गए थे | ये पंक्तिया उन्ही विद्यार्थियों के लिए फेयरवेल पार्टी के बाद लिखी गयी थी| यहाँ का प्रत्येक विद्यार्थी, सहकर्मी और संपर्क में आया कोई भी व्यक्ति एक मधुर याद के साथ प्रेरित करता है| यहाँ मै काम करना सीखा, पहली बार दुनिया को जानने को मिला और एक सपना बना, और इसी कारण यहाँ हूँ इन पंक्तियों  के साथ ........

" एक और बात "
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रह  जाती एक और बात, 
कह देने के बाद भी सारी बात,
दिल है की मानता नही,
पूरे न हो पाते जज्बात |1| 
---
होती है मस्ती और धूम,
जुड़ते है जब दिलों के तार,
दायरों को चीरकर,
निकलते है जब हम-कदम |2|
---
सीमाओं से यदि हो मन संकुचित,
तो होना चाहिए इतना बड़ा दिल,
कि समा सके हर पल,
हर क्षण की यादें समुचित |3|
---
क्या है हालत और हालात,
कहाँ होनी है ख़त्म?
कि हर ख़ामोशी के बाद उठती है,
जगती है नई और बात |4| 
---
दे रहा हूँ हाथ को हाथ,
कि डूबने को बहुत है,
और बहुत है संभलने को,
एक तेरी  याद और एक तेरा साथ |5| 
---
नही रोक पाउँगा,
आँखें छोड़ ही देंगी बाँध,
आंसुओं के वे मोती,
यादों की माला  में पिरोऊंगा |6|
---
शुभ होता है बच्चे का रोना,
ख़ुशी होती है सुनकर,
हूँ उस सा मासूम आज, ख़ुशी होगी-,
होगा जब अगला मिलना |7|
---
छोटी सी बात कहना विशेष है,
मेरा व्यवहार तुमसे, तुम्हारा ही है,
पहले  कभी खाली था,
मगर अब यादें शेष है |8|
---
बात करने को जी कर रह बार-बार है,
अब रुकता हूँ ,
की बात से  बात जुडती है,
अब विदा दोस्तों, अगले मिलन का इन्तजार है |9|
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ललित कर्मा, इंदौर 
२३/०५/२००७

Monday, December 20, 2010

"गुत्थम गुत्थी-2"


सबको राम-राम,
काम हम मे से हर कोई करता है| हम दिखते है काम करते हुए मगर भीतर विचारों का कितना कोलाहल होता है नही दिखता | हमारा मष्तिष्क रणभूमि बना रहता है जिसमे अच्छे विचारों, कार्य सम्बन्धी विचारों पर ध्यान लगाकर बुरे-व्यर्थ  विचारों को पछाड़ते रहते है| काम करते-करते कोई लक्ष्य निर्धारित हो जाता है ओर इसे पाने के लिए फिर घमासान शुरू हो जाता है क्योकि इस कुरुक्षेत्र में महाभारत कभी खत्म नही होता.........





"गुत्थम-गुत्थी"

काम प्रतिदिन है करता,
बिन सपना, बिना लक्ष्य के,
अपनी बुद्धि-विवेक उपयोग किये बिन,
किसी भांति पूरा कर लेता |१|
---
सपना जागा, मिली खुद से ललकार,
बात विशेष हुई यह एक दिन,
जी अपने से, न बन दीन, कार्य करना है-, 
कर, बना अपना आधार, हो सपना साकार |२| 
---
स्वीकार हुई चुनौती,
चंचल मन को न थाम सका,
संयत होने की कोशिश की,
कर्म-यज्ञ में निश्चित की स्व की आहुति |3|
---
कहीं रहे विरल, कहीं रहे घने,
भगदड़ विचारों की ऐसी रही,
ध्यान धरा ईशराम का,
तब कुछ दस-पंद्रह विचार सहायक बने |4|  
---
कुविचार विघ्न बन करते रहे प्रहार,
संख्या में ज्यादा थे ये,
कम संख्या में थे सुविचार,
फिर भी करते शत्रु का कड़ा प्रतिकार |5|
---
कार्य-यज्ञ प्रारंभ हो चला था,
सत-असत का भीषण मचा था, 
सत से घायल, कभी सत हो घायल,
अब भीतर मगर आशादीप जला था |६| 
---
कार्य है पूर्णता की ओर,
सात्विक रणबांकुरे पूरजोर सक्रिय, 
प्रकाश की चौंधियाहट है,
रणछोड़ रहे है आवारा कुविचार |7|  
---
सुविचारो ने  विजय-ध्वज फहराया-,
मय शंख-ध्वनि के, छुटपुट  चोटें आयी,
मगर उत्साह, उमंग संग, 
कार्य पूर्ण होने का उत्सव मनाया |8|
---
रणभूमि में व्यर्थ विचारों के शव पड़े,
शेष-घायल भाग गए,
व्यर्थ प्राण गवाने,
पांडवों से कौन लड़े |9| 
---
कार्य भली-भांति पूर्ण हुआ, 
विश्वास नया मित्र हुआ अब,
अगले सारे कार्यो का मार्ग निष्कंटक हुआ, 
लक्ष शीघ्र पाउँगा, यह अब तय हुआ |10|
---
सावधान बने रहे सत्मित,
अगले कार्यो में आरम्भ से अंत तक,
शंका, व्यर्थ विचार उठा कोई,
कर-धर-शर साध निशाना करते वही चित |11|
---
कितने ही? महाभारत होते है रोज,
व्यर्थ, आवारा विचारों से,
लक्ष्यहित हो जीतने के लिए,
करनी होती है सुविचारो की खोज |12|  
---
दिखते है शारीरिक भाषा से,
जुटे हुए है मैं, हम, तुम,
जीतेंगे ही हर महाभारत,
प्रेषित है इसी आशा से |13|
--------------------------------------------------------
ललित कर्मा, इंदौर
(२१/०९/१० से १७/१२/१० को पूर्ण)









Monday, December 13, 2010

"गुत्थम-गुत्थी"

सबको राम-राम,
काम हम मे से हर कोई करता है| हम दिखते है काम करते हुए मगर भीतर विचारों का कितना कोलाहल होता है नही दिखता | हमारा मष्तिष्क रणभूमि बना रहता है जिसमे अच्छे विचारों, कार्य सम्बन्धी विचारों पर ध्यान लगाकर बुरे-व्यर्थ  विचारों को पछाड़ते रहते है| इस कुरुक्षेत्र में महाभारत कभी खत्म नही होता.........





"गुत्थम-गुत्थी"

एक काम का एक विचार,
दस विचार सहायक बने,
पचासों तैयार है उनसे लड़ने के लिए,
एक ने बुलाया दस को,
दस ने लगाया समय,
पचास को पछाड़ने  में,
रणभूमि में युद्ध के अंत में,
घायल-मरे वीरों के शरीर वैसे ही,
दस में से दो चार बुरे आहत,
किन्तु विजय की मुस्कान,
पचास की वीर सेना,
बुरी तरह हारी हुई,
बीस-पच्चीस उनके मरे,
बाकी बुरी तरह आहत,
इस लड़ाई में एक विचार  जीता,
और काम पूरा हुआ|
दूजा काम भी करना है,
फिर रणभेरी बजा,
पान्चजन्य ने महाभारत,
का उद्घोष किया,
अर्जुन कर्मवेदी पर तैयार,
हर व्यूह के लिए तैयार,
अब सशस्त्र सेना,
आत्मविश्वास से भरपूर है,
चूंकि पचास की सेना हारी थी,
सो आक्रमण नही हुआ,
और न ही दस को लड़ना पड़ा,
सावधान बने रहे,
छुटपुट कोलाहल होता रहा,
दूसरा काम तो,
बिना  विघ्न विशेष के पूरा हुआ,
कितने?
रोज ही महाभारत होते
मेरे, तुम्हारे, हमारे,
कुरुक्षेत्र में...........|
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ललित कर्मा, इंदौर
०४/१०/२००४

"फुर्सत में ध्यान"

सबको राम-राम,
मन-बुद्धि-आत्मा का मिलना ऐसा है की तीन मित्र साथ बैठे है और  अपने   कार्य-व्यवहार की चर्चा कर रहे है| ध्यान में पहला चरण होता है  हमारे कार्यो-जिम्मेदारियों  की चिंता और फिर धीरे-धीरे  उनका लोप होना और अंत में पहचान  होती है स्व से ............... इनका साथ होकर कुछ ऐसा हुआ ......




"फुर्सत में ध्यान"



आओं, बैठो, बैठकर,

कुछ सोचे-विचारें,

सब काम पुरे हो गए,

और कुछ चल रहे है,

फुर्सत के कुछ क्षण मिले है,

मिलते रोज ही है,

पर बैठना कहाँ हो पाता है?

आज बैठे तो सही,

आज तो बैठ ही जाते है,

कुछ सोंचेंगे, कुछ बतियाएंगे,

वो सभी जो मैं, तुम, हम,

सोचते है, करते है,

यूँ तो साथ है जब से जन्मे,

मिलते है कभी कभी,

मैं, तुम, हम, कौन है जाने आओं,

बैठकर, बतियाएं, सोचे-विचारें,

मैं, तुम, हम, कहेंगे,

मैं, तुम, हम, सुनेंगे,

बातें वही-वही होंगी,

फिर भी नया कुछ होगा,

आओं, कुछ देर बैठे,

बतियाएं, सोचे-विचारें|
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ललित कर्मा, इंदौर
०२/१०/२००४

"जीवन की गाड़ी"

सबको राम-राम,
बहुत बारीक़ सी बात है ध्यान देने की है| जब-जब भी ध्यान आत्मा को छूता है  खोने-पाने के पर हो जाता है जीवन और आनंदमय हो आगे बढता है| जीवन निरंतर है, चलता जाता है हमारे कहने से नहीं चलता-रुकता| दुनियादारी में तरक्की के जो मायने है उन्हें पायें या टाले कोई फर्क नहीं पड़ता जीवन समय के पहियों पर सवार हो आगे बढता जाता है.......


"जीवन की गाड़ी"

पगभर  भी यदि माना,
तो गाड़ी तो चली,
मील भी चली,
तब गाड़ी तो चली,
ना भी तुने कुछ किया,
तब समय के पहिये,
तुझे बताएँगे,
स्थिर होकर गाड़ी तो चली,
मैं, तुम, हम,
मेरी, तुम्हारी, हमारी,
मर्जी से चलाना चाहते है गाड़ी,
तब भी गाड़ी चली तो,
मन कहे,
यह राह मेरी नहीं,
बुद्धि का अपना अलग जोर,
आत्मा की थाह तो,
विचार ही नहीं पंहुचा ,
फिर भी गाड़ी तो चली,
समय पहिये है, जिंदगी गाड़ी है,
और इस गाड़ी के सवार ,
मैं, तुम,हम........
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ललित कर्मा, इंदौर
 06/10/2004

Monday, December 6, 2010

लंगड़ी.....

सबको राम राम ....
बहुत से दृश्य दिन भर में आँखों के सामने से गुजरते है| कभी किसी पर मौके पर हम उस  दृश्य से जुड़ जाते है और तब ही कुछ कहने, करने या लिखने की इच्छा जगती है| ऐसा ही एक दिन हुआ ... थोडा ही लिखा है मन और  भी लिखूं पर जी बहुत भारी होकर कलम को आगे नहीं बढने देता|

लंगड़ी

वह चलती है  घुटने पर हाथ धरकर ,
मैं हर माध्यम से उससे अपरिचित हूँ ,
उसे चलते-फिरते दृश्यमात्र की भांति जाना ,
सहसा उसके बचपन की कल्पना जागी ,
उसके सहपाठी लंगड़ी-लंगड़ी चिढाते होंगे,
माता-पिता को कोष होगा या उस ईश्वर को,
मेरा  मन इस कल्पना से द्रवित हो गया,
लंगड़ी का दंश वह सह रही है,
यह सोच मन करुणामय हो गया,
ऐ बेटी क्षमा चाहता हूँ  तुझसे,
तेरी इस अवस्था पर मात्र रो रहा हूँ,
संभवतः हो तूने निष्ठुर सच को अपनाकर,
जीना सिख लिया हो,
मगर मैं रोऊंगा आज जी भर,
सविनय प्रार्थना करूँगा,
उन श्रीराम से जिन्होंने सबको बनाया है| 


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ललित कर्मा, इंदौर

Thursday, December 2, 2010

दुनियादारी

मन और बुद्धि  की अपनी-अपनी अलग दुनिया होती है| कभी-कभी ही इन दोनों का साम्य हो पता है| अक्सर दोनों बहस करते पाये जाते है| दोनों के आचार-विचार में अंतर का एक नमूना यहाँ प्रस्तुत है | 
दुनियादारी 

जितना हल्का हो,
दुनिया पड़ती है उतनी भारी ,
क्या करे ?,
निभानी है हमको दुनियादारी |१|

मैं मस्त अपनी दुनिया में,
निभा तू तेरी जिम्मेदारी,
है मुझको प्यारी,
मुझसे मेरी यारी |२|
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ललित कर्मा, इंदौर


Wednesday, September 1, 2010

"सच्ची वीरता"


मैथिलिशरण गुप्तजी की भारत भारती पढने के बाद यह रचना लिखी थी। एक कविता का अंकुरण हुआ और यह बन पडी। यह कविता एक कहानी का अंत है। वह कहानी पन्नो पर आराम कर रही है।

"सच्ची वीरता"

वीर थे जो बडे-बडे,
काल कलवित हो गये,
क्या बताये?क्या सुनाये?,
रणभूमी मे थे जो लडे॥१॥

जयघोष जनो से लगवाकर,
क्या मिला उन लोगो को,
महल सम्पदा सब छोड गये,
अंत हुआ अग्नि मे जलकर॥२॥

मान लिया रण जीतने मे है वीरता,
पाप हत्याओं का लेकर,
सुन मातृशक्ति,मासूमों की आह,
देखो सीना कितना है फ़ूलता?॥३॥

और भी है माध्यम हरे,
भू-भाग जीतने के इतर,
है कौन नर भूप ऐसा,
जो जन प्रियों का दुखः हरे?॥४॥

जीतना है तो दिखला ही दो,
है ह्रदय जो बन्जर पडे,
कौन कहेगा फिर तुम्हे कि,
आप ही मान सन्मान न दो ॥५॥

रण जीतना मात्र ही पौरुष का दर्शन नही,
कला-कौशलों को सिखने का,
ग्रहण किया क्या यही अर्थ है,
क्या बतलाये? ना समझे तो है पत्थर वही॥६॥

ललित कर्मा
वैशाली नगर, इन्दौर

Tuesday, August 31, 2010

"आप इंसान को इंसान बनाते"

शिक्षक दिवस पर............   

"आप इंसान को इंसान बनाते"



चरित्र निर्माण की दो संस्था है,
एक माता और दूजे गुरु,
इन्ही की सीख के बाद होता है,
जीवन का सफ़र शुरू ||१||

माँ से पग पग चलना सीखा,
पर जग में यह सोच भरमाया,
किस डगर चलूं? क्या हो जीवन लक्ष्य?,
धन्य गुरु ने ज्ञानाशीष  दे, सुपथ सुझाया||२||

संसार भ्रमों का जाल भी है,
कहीं  भटकता तो कहीं उलझता,
एक यदि गुरु ना मिलते,
तो कीड़े जैसा जीता मरता ||३||

ज्ञानसागर अथाह, अनंत है,
मूर्ख मै कहां यह जान पाता?,
गंगाजी के तट ना आता,
तो कूपमंडूक  हो टर्र-टर्र इतराता ||४||

आप आत्मा को निर्मल करते,
और बुद्धि को प्रखर बनाते,
आप धरा के प्रथम देवता,
आप इंसान को इंसान बनाते ||५||

आप गोविन्द का ज्ञान कराते,
आप बिन नरक सम, स्वर्ग-महि,
गुरु साक्षात् परब्रह्म कहते है,
है यह वेद वाणी सही ||६||

प्रथम प्रेरणा आप ही है,
आप ही हो मेरा विश्वाश,
आपकी शिक्षा से जो पाया है,
सोच होता सुकून अहसास ||७||

जीवन में अब तक काम आई है,
सच कहता हूँ आपकी दी शिक्षा,
और शेष  भी इससे कुशल होगा,
जीतता जाऊंगा हर सफल परीक्षा ||८|| 

याद है वे सारे सुपल,
वो समय जो आपके सानिध्य में बीता,
ध्यान होता है, जीवन-घड़ा,
मेरा रह जाता आप बिन रीता ||९||