सबको राम राम......
पहली शुरुआत मैंने मन की बातों को लिखने से की थी..बहुत हलकान होती थी..ऐसा
लगता था ध्यान करके उठा हूँ..शुरूआती दौर में ख़राब लिखे से भी प्यार करने
लगा..लगभग प्रतिदिन लिखता..कभी कभी लगता कि बहुत अच्छा बन पड़ा..बस उसी
समय से यह शौक और बढ़ गया..इंसान किसी को कहे नही, मन ही मन खुद को बहुत
ज्यादा मानता कि मैं ये हूँ, वो हूँ..इस स्वभाव से मैं भी अछूता नही
रहा..खुद को कही किसी कतार में खड़ा जरुर पाता हूँ ..बस शुरूआती दौर में
लिखी यह रचना वैसी ही है जो मुझसे, मेरे और को अवगत कराती है..शायद ज्यादा कह गया लेकिन अब कह ही दिया है देख लेंगे...आप सबकी मंगल कामना के साथ..
कोरा कागज, हाथ में कलम
और कुछ विचारों से
शुरू करता मैं सफ़र|
लोगो की दुनिया से अलग
अलग दुनिया में बैठा
विचारों को संगृहीत कर
संतुलित करता|
शब्द कुछ कतार में ऊपर
कुछ कतार के नीचे
और कोरे कागज का इतिहास बदलता|
जब कम पड़ते विचार
आँखे उठाकर आसपास की
हरकतों, चहल-पहल को देखता
और कुछ को विचार श्रृंखला में जकड लेता|
परिमार्जन करता उनका
और कलम से उतार लेता
कोरे कागज पर
और मैं साधारण से
सृजनशील इन्सान हो जाता,
नए धरातल को छूता|
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ललित कर्मा
१०/०४/२००५